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Sunday, May 3, 2026
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पुस्तक समीक्षा : रवांल्टी शब्दकोश-लोक भाषा को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास

  • प्रदीप रावत ‘रवांल्टा’

दिनेश रावत की यह पुस्तक उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की रवांई घाटी की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। पुस्तक का पूरा शीर्षक रवांल्टी शब्दकोश है, जो एक तरह से “हिंदी-रवांल्टी-अंग्रेजी के त्रिभाषी शब्दकोश” है। इसमें रवांई क्षेत्र की स्थानीय बोली रवांल्टी के शब्दों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। यह एक बेहतरीन त्रिभाषी शब्दकोश है, जो मातृभाषा के रूप में रवांल्टी को केंद्र में रखते हुए देश-दुनिया तक इसके वैभव को पहुंचाने का सराहनीय कार्य करता है।

सामग्री और संरचना
पुस्तक में रवांई क्षेत्र के लोकजीवन, संस्कृति, परंपराओं, देवालयों और दैनिक बोलचाल के शब्दों का विस्तृत संकलन है। आपको पुस्तक की अनुक्रमणिका से ही पता चल जाएगा कि पुस्तक के पन्नों पर आपको क्या-क्या पढ़ने को मिलने वाला है। पुस्तक में लोकजीवन, सांस्कृतिक विरासत, देवगाथाएं, खान-पान, रहन-सहन और लोक प्रचलित शब्दों को समेटा गया है। लेखक ने रवांई की समृद्ध परंपराओं को न केवल शब्दों के रूप में दर्ज किया है, बल्कि उनके सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ भी दिए हैं। प्रस्तावना में दिनेश रावत अपनी मातृभूमि रवांई के प्रति गहन प्रेम व्यक्त करते हैं और बताते हैं कि कैसे यह बोली हिमालय की गोद में पली-बढ़ी है, लेकिन आधुनिकता के दौर में पीछे ना छूटे उसके लिए उन्होंने यह अभिनव पहल की है।

पुस्तक का मुख्य हिस्सा शब्दकोश है, जहां रवांल्टी शब्दों के हिंदी और अंग्रेजी समानार्थी दिए गए हैं। उदाहरण के लिए, स्थानीय देवताओं, लोककथाओं, कृषि, प्रकृति और दैनिक जीवन से जुड़े शब्दों का संकलन बेहद समृद्ध है। अंतिम पृष्ठों पर लेखक का व्यक्तिगत स्पर्श दिखता है, जहां वे रवांई की सांस्कृतिक-सामाजिक विशेषताओं का वर्णन करते हैं।

पुस्तक की विशेषताएं और महत्व
संरक्षण का प्रयासर : रवांल्टी जैसी क्षेत्रीय बोलियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं। ऐसे में यह शब्दकोश न केवल शब्दों को बचाता है, बल्कि पूरी सांस्कृतिक विरासत को दस्तावेजीकृत करता है।

त्रिभाषी दृष्टिकोण: हिंदी और अंग्रेजी के साथ रवांल्टी को जोड़कर यह पुस्तक स्थानीय लोगों के साथ-साथ शोधकर्ताओं, भाषाविदों और पर्यटकों के लिए उपयोगी है। यह पुस्तक नई पीढ़ी को निश्चित ही अपनी भाषा को वैज्ञानिक ढंग से समझने का असवर प्रदान करेगी। साथ ही अपनी लोक भाषा की ओर आकर्षित करने में भी कारगर साबित होगी।

लेखन शैली: पुस्त की लेखन शैली बेहत सरल, भावपूर्ण और प्रामाणिक है। दिनेश रावत जो शिक्षक और लोक संस्कृतिकर्मी हैं, वे अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हैं, जो इस पुस्तक के हर पृष्ठ पर झलकता है।

रवांई की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा
यह पुस्तक केवल एक शब्दकोश नहीं, बल्कि रवांई की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा का दर्पण है। उत्तराखंड की क्षेत्रीय बोलियों और लोक संस्कृति में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है। दिनेश रावत ने अपनी मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति जो श्रद्धा दिखाई है, वह प्रेरणादायी है। यह कार्य भावी पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत साबित होगा।

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लेखक परिचय: दिनेश रावत
दिनेश रावत हिमालय की गोद में बसी उत्तराखंड की रवांई घाटी के एक सजग सांस्कृतिक संवाहक एवं समर्पित साहित्यकार हैं। उनका जन्म 7 जून 1981 को उत्तरकाशी जिले के रवांई क्षेत्र के कोटी, बनाल गांव में हुआ। प्रकृति की छांव में पले-बढ़े दिनेश रावत ने अपनी मातृभूमि की मिट्टी, लोक कथाओं, देवगाथाओं और स्थानीय बोली रवांल्टी की सुगंध को बचपन से ही हृदय में संजोया है। दिनेश रावत संवेदनशील कवि, लेखक, लोकसंस्कृतिकर्मी और समर्पित शिक्षक हैं। विज्ञान स्नातक के पश्चात् इतिहास, समाजशास्त्र व शिक्षा शास्त्र में स्नातकोत्तर और बी.एड. की उपाधि प्राप्त कर उन्होंने अपनी बौद्धिक यात्रा को लोक की माटी से जोड़ा।

उनकी रचनाएं हिमालयी लोकजीवन की गहन अनुभूति से आप्लावित हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं’, ‘रवांई क्षेत्र के लोकदेवता एवं लोकोत्सव’, ‘माटी’, ‘तेरे जाने के बाद’, ‘पहाड़ बनते पहाड़’ (कविता संग्रह), ‘का न हंदू’ (रवांल्टी कविता संग्रह) और ‘रवांल्टी शब्दकोश’ उल्लेखनीय हैं। ये रचनाएं रवांई की सांस्कृतिक धरोहर, देवगाथाओं और क्षेत्रीय भाषा की संरक्षा में अमूल्य योगदान हैं।

बहुआयामी दिनेश रावत ‘हिमांतर’ के हिमालयी लोक कला-साहित्य-संस्कृति और रवांल्टी कविता विशेषांक, ‘राहें हमारी’ विद्यालयी पत्रिका और ‘श्री रघुनाथ चरितावली’ का कुशल सम्पादन भी कर चुके हैं। यह उनकी सृजनशीलता का प्रमाण है। उत्तराखंड की लोकभाषाओं, विरासत एवं शब्दकोश निर्माण संबंधी राज्य स्तरीय पुस्तकों के लेखन-संपादन मंडल में उनकी सक्रिय सदस्यता उनकी विद्वत्ता को रेखांकित करती है।

दूरदर्शन और आकाशवाणी के माध्यम से लोकभाषा कवि सम्मेलनों एवं वार्ताओं का संचालन-प्रतिभागिता के साथ ही देशव्यापी पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन और सेमिनारों में शोध-पत्र प्रस्तुति उनकी साहित्यिक पहुंच को दर्शाती है। उन्हें राष्ट्रीय युवा पुरस्कार-2009, विज्ञान शिक्षा एवं प्रसार सम्मान-2022, देवभूमि उत्कृष्ट शिक्षा सम्मान-2023, टीचर्स ऑफ दी इयर-2021 सहित अनेक सम्मानों से विभूषित किया गया है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

वर्तमान में वे हरिद्वार के राजकीय प्राथमिक विद्यालय नंबर-4, ज्वालापुर में अध्यापन कर रहे हैं, जहां वे भावी पीढ़ी को लोकसंस्कृति व शिक्षा की ज्योति प्रदान कर रहे हैं। उनकी रचनाएं एवं कर्म हिमालय की उस अटल माटी की तरह हैं, जो सदैव लोक की सेवा में समर्पित रहती है।

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