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Friday, October 9, 2026
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नाना पाटेकर का निधन: 45 मिनट तक चला जिंदगी बचाने का प्रयास, फिर थम गई सांसें

  • ‘परिंदा’ से ‘वेलकम’ तक दमदार अभिनय की छोड़ी अमिट छाप, तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री से हुए सम्मानित

मुंबई। हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह निधन हो गया। बताया गया है कि सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया। उन्हें बचाने के लिए करीब 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन चिकित्सकों के प्रयास सफल नहीं हो सके। उनके निधन की खबर से फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

जानकारी के मुताबिक, नाना पाटेकर को उनके घर पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया। गोवा के मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर सालकर ने बताया कि उन्हें बचाने के लिए लंबे समय तक सीपीआर दिया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। मामले में मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) दर्ज किया गया है और पोस्टमार्टम कराया जाएगा।

विश्वनाथ पाटेकर से बने नाना

नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। अभिनय के साथ-साथ वह निर्देशक, लेखक और फिल्म निर्माता के रूप में भी सक्रिय रहे। अपने सशक्त संवाद अदायगी और अलग-अलग तरह के किरदारों के कारण उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

नाना पाटेकर ने वर्ष 1978 में फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में काम किया। वर्ष 1988 में मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ में उनके अभिनय को सराहा गया। इसके बाद 1989 में आई फिल्म ‘परिंदा’ ने उनके करियर को नई ऊंचाई दी। फिल्म में गैंगस्टर की भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

गंभीर किरदारों से लेकर कॉमेडी तक बनाई पहचान

नाना पाटेकर ने अपने लंबे फिल्मी करियर में एक से बढ़कर एक यादगार किरदार निभाए। ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘प्रहार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब पसंद किया।

गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं के लिए पहचान बनाने वाले नाना पाटेकर ने कॉमेडी और व्यावसायिक सिनेमा में भी अपनी अलग छाप छोड़ी। ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के किरदार ने उनकी अभिनय क्षमता का एक अलग पक्ष दर्शकों के सामने रखा।

‘क्रांतिवीर’ ने दिलाया राष्ट्रीय पुरस्कार

वर्ष 1994 में रिलीज हुई ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल रही। फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘परिंदा’ और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका था।

अपने शानदार अभिनय के लिए नाना पाटेकर को कुल तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार फिल्मफेयर पुरस्कार और दो फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार मिले। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया।

निर्देशन में भी आजमाया हाथ

नाना पाटेकर केवल अभिनेता ही नहीं थे। उन्होंने निर्देशन के क्षेत्र में भी काम किया। उनकी निर्देशित फिल्मों में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ प्रमुख रही। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने लंबे समय तक सक्रिय भूमिका निभाई और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को व्यापक सराहना मिली।

सेना से भी रहा जुड़ाव

फिल्मों के अलावा नाना पाटेकर का भारतीय प्रादेशिक सेना से भी जुड़ाव रहा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 1990 में उन्हें भारतीय प्रादेशिक सेना में मानद कप्तान नियुक्त किया गया था। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट में मानद मेजर के तौर पर सेवाएं भी दी थीं।

अभिनय की एक अलग शैली के लिए हमेशा याद किए जाएंगे

नाना पाटेकर की पहचान केवल उनके निभाए किरदारों से नहीं, बल्कि संवाद बोलने की विशिष्ट शैली, भावनात्मक अभिव्यक्ति और किरदार में पूरी तरह ढल जाने की क्षमता से बनी। उन्होंने पर्दे पर नायक, खलनायक, पुलिस अधिकारी, सैनिक, गैंगस्टर और आम आदमी जैसे कई किरदारों को जीवंत किया।

उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने दशकों तक अपने अभिनय से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। ‘परिंदा’ से ‘क्रांतिवीर’ और ‘अब तक छप्पन’ से ‘वेलकम’ तक नाना पाटेकर का फिल्मी सफर भारतीय सिनेमा के यादगार अध्यायों में शामिल रहेगा।

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