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Thursday, October 22, 2026
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‘गणेश गोदियाल और प्रीतम सिंह सरकार हटाओ, धामी हटाओ का नारा नहीं लगाएंगे तो क्या आलू छीलेंगे?’

  • ‘रिजीम चेंज’ से भाजपा क्यों बेचैन?
  • विपक्ष का काम सरकार बदलने की लड़ाई लड़ना.
  • कांग्रेस नेताओं के समर्थन में उठी आवाज।

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) को लेकर सियासी बहस तेज होती नजर आ रही है। भाजपा और उसके समर्थकों की कथित बेचैनी पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग करना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार और राजनीतिक जिम्मेदारी है। सरकार की नीतियों का विरोध करना, जनहित के मुद्दों को उठाना और जनता के बीच वैकल्पिक सरकार का प्रस्ताव रखना विपक्ष की भूमिका का अहम हिस्सा है।

इस संबंध में उठाए गए सवालों में कहा गया है कि लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी देश और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, शांति एवं सौहार्द बनाए रखने, सदन में बहुमत कायम रखने और जनता से किए गए वादों को पूरा करने की होती है। वहीं, विपक्ष का दायित्व सरकार की उन नीतियों का विरोध करना है, जिन्हें वह जनहित के खिलाफ मानता है। इसके साथ ही विपक्ष को जनता के बीच जाकर सरकार की नीतियों का विकल्प प्रस्तुत करना चाहिए।

सत्ता परिवर्तन को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए तर्क दिया गया कि यदि विपक्ष सरकार बदलने की बात ही नहीं करेगा, तो उसकी राजनीतिक भूमिका का औचित्य क्या रह जाएगा? सरकार की नीतियों से असहमति जताने के साथ-साथ विपक्ष का उद्देश्य जनता का विश्वास हासिल कर संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में बदलाव लाना भी होता है।

उत्तराखंड के संदर्भ में कांग्रेस नेताओं प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यदि विपक्ष के नेता प्रदेश में सरकार बदलने और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार को हटाने की मांग नहीं उठाएंगे, तो फिर विपक्ष अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी कैसे निभाएगा? सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करना और जनता के सामने वैकल्पिक नीतियां रखना विपक्ष की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस राजनीतिक तर्क के अनुसार, ‘रिजीम चेंज’ को केवल विवादित नारे के रूप में देखने के बजाय इसे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा और सत्ता परिवर्तन की सामान्य प्रक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए। हालांकि, किसी भी सरकार को हटाने का अंतिम निर्णय जनता अपने मताधिकार के माध्यम से करती है और सत्ता परिवर्तन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही संभव है।

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज होने की संभावना है। ऐसे में सत्ता परिवर्तन का मुद्दा आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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